गीली मिट्टी की ख़ुशबू को petrichor कह दो तो कैसा बेग़ाना सा लगता है ना? एकदम फ़ीका सा, जैसे किसी ने शब्द का पूरा रस ही निचोड़ लिया हो। जो बात गीली मिट्टी से शुरू हो कर उसकी सौंधी-सौंधी ख़ुशबू तक पहुँचती है, वो petrichor कहने से एक लफ़्ज़ में ही ख़त्म हो जाती है। न कविता का रस आ पाता है और न ही पुरानी यादें ताज़ा हो पाती हैं। और यादों का धागा कहीं न कहीं भाषा से ज़रूर जुड़ा है। वो भाषा जो हम बोलते हुए बड़े हुए हैं, हमारी मातृभाषा।

मेरी मातृभाषा हिंदी है। हिंदी माध्यम में पढ़ी हूँ और हिंदी में ही सोचती हूँ। पर अब सिर्फ़ अंग्रेजी़ में ही लिखती हूँ। ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी से प्यार नहीं है। लेखिका हूँ और इस भाषा से तो अब मेरा जीवन जुड़ा है। अंग्रेजी मेरी कर्म भाषा है और हिंदी मेरी धर्म भाषा। जब दिल की बात कहनी होगी तो हिंदी में ही कहूंगी क्योंकि उसमें वही सौ़धापन है जो गीली मिट्टी की ख़ुशबू में है।

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