अंटैची एक काली सी झांकती है अलमारी के कोनों से, बहुत सी बंद यादें हैं जो अब ढूँढे नहीं मिलतीं

कुछ रंग हैं कच्चे पक्के से और एक किताब कहानी की, सुराही का ठंडा पानी और मीठी सी फ़टकार वो नानी की 

नादान से वो खेल और मिट्टी के कुछ बरतन जिनमे बड़े जतन से झूठी सच्ची रसोई पकाई थी, उन बरतनों की सौंधी सौंधी ख़ुश्बू भी है बंद वहीं

अचार के कुछ लुक्मे जो चुराए थे माँ की पीठ परे, खट्टी मीठी वो चोरी की चटखार भी शायद मिल जाए

एक मटका था पानी का जिसकी ठंडी सतह पर गाल टिका के घंटों बैठे रहते थे, AC से ठंडे उस मटके की हल्की हल्की थपकी भी रख छोड़ी थी वहीं कहीं

और एक छोटा सा बच्चा है, बड़ी हसरत से तकता है, कि अब तो खेल ये ’growing up’ के छोड़ेंगे

और फिर से लौट लेंगे उनही नालों में नहरों में लिए कागज़ की एक कश्ती, उनही खेतों में बागों में जहँ फलते थे आम और लीची

उनही छत की मुंडेरों पर जहाँ जाड़े की उजली धूप खिलती है, उनही रातों में जहाँ तारों के नीचे नींद एक सुकूं की मिलती है

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