इधर सुबहें कुछ बुझी बुझी सी लगती हैं,
आँख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन पे तुम्हारे नाम की चमक के बदले अब घुप्प अँधेरा दिखता है,
दिन वैसे ही चलता है,
बस कहीं किसी कोने में लेकिन सन्नाटा सा लगता है,
शामें भी नाराज़ ही हैं, कुछ कटी कटी सी रहतीं हैं,
खाली हाथ रात के आने का डर अब इनको भी शायद लगता है।
वक़्त भी बिखरा बिखरा है,
बातों के धागों से जो जोड़ जोड़ के रक्खा था, अब सब उधडा उधडा है
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